






धरमजयगढ,रायगढ़। राज्य सरकार और केंद्र शासन की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं गरीब, मजदूर और ग्रामीण तबके के जीवन स्तर को सुधारने हेतु चलाई जा रही हैं। इनमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), प्रधानमंत्री आवास योजना (को ग्रामीण), राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन, शौचालय निर्माण, सामुदायिक भवन निर्माण, वृक्षारोपण अभियान जैसे कई योजनाएं शामिल हैं, जिनका मूल उद्देश्य ग्रामीण विकास, गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन है। वहीं इन सभी योजनाओं में पारदर्शिता और जनभागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से “सामाजिक अंकेक्षण” जैसी प्रणाली लागू की गई है, ताकि यह जाना जा सके कि योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र हितग्राहियों तक पहुंच रहा है या नहीं। सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से पंचायत स्तर पर जॉब कार्ड सत्यापन,कार्य की गुणवत्ता जांच,भुगतान में पारदर्शिता,दीवार लेखन,ग्रामसभा का आयोजन और हितग्राहियों से सीधा संवाद कर योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने लाई जाती है।
इन्हीं निर्देशों के पालन हेतु रायगढ़ जिले में 24 जुलाई से 29 जुलाई 2025 के मध्य सामाजिक अंकेक्षण अभियान चलाया जा रहा है। बता दें,जनपद पंचायत धरमजयगढ़ के अंतर्गत ग्राम पंचायत पुसल्दा में सामाजिक अंकेक्षक के रूप में हरीशचंद्र यादव तथा ग्राम पंचायत पत्थलगांव खुर्द में अमरजीत चौहान की नियुक्ति की गई है।
लेकिन हकीकत इससे अलग है– जब हमारी टीम ने इन पंचायतों का दौरा कर ग्रामीणों से बात की, तो यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि न तो किसी ग्रामीण को सामाजिक अंकेक्षण की जानकारी है, और न ही पंचायत में कोई गतिविधि होती दिखी।
बता दें, जिला मुख्यकार्यपालन रायगढ़ के निर्देश दिए गए अनुसार आज अंकेक्षण का चौथा दिन है, लेकिन अधिकारी अब तक पंचायत में दिखाई नहीं दिए हैं। न कहीं कोई दीवार लेखन हुआ है, न ही विशेष ग्रामसभा का आयोजन। यह स्थिति शासन के पारदर्शिता मिशन पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है। क्या सामाजिक अंकेक्षण का उद्देश्य केवल कागजी खानापूर्ति रह गया है? अगर योजनाओं का मूल्यांकन कक्षों में बैठकर किया जाएगा और ग्रामीणों की सहभागिता ही नहीं होगी, तो फिर पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी? जब इस मामले को लेकर डीएसएफ अधिकारी जितेंद्र टंडन से फोन पर चर्चा की गई, तो उनके द्वारा काल को कांफ्रेंस कर संबंधित से बात करते हुए,के बाद उन्होंने बताया कि संबंधित अधिकारियों की व्यापम परीक्षा के कारण उपस्थिति संभव नहीं हो सकने का हवाला दिया गया। साथ ही यह भी कहा कि कल बैठक है, जांच करने के बाद यदि लापरवाही पाई जाती है, तो कार्रवाई की जाएगी।
परंतु सवाल यही है –परीक्षा का बहाना आज का है, पर बीते तीन दिनों में पंचायतों की अनदेखी का क्या जवाब है? क्या ग्रामीणों को योजनाओं की जानकारी देना, हितग्राहियों से संवाद करना और जमीनी सच्चाई जानना ही सामाजिक अंकेक्षण का मूल उद्देश्य नहीं है? तो फिर यह कैसी अंकेक्षण प्रक्रिया और कैसे अंकेक्षक, जो अपने कर्तव्यों से ही गायब हैं? यदि इस प्रकार योजनाओं की निगरानी और मूल्यांकन होगा, तो भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा और जनकल्याण का सपना कैसे साकार होगा?
अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर क्या ठोस कदम उठाता है। क्या हरीश चंद्र यादव और अमरजीत चौहान जैसे जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी, या यह मामला भी उच्च अधिकारियों के संज्ञान तले दब जाएगा?






