
धरमजयगढ़। इन दिनों छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पूरे जोर-शोर पर है। शासन की ओर से यह प्रक्रिया आगामी नववर्ष 2026 के जनवरी माह तक जारी रहने की संभावना जताई जा रही है और जनवरी में भी बड़े पैमाने पर धान खरीदी का अनुमान लगाया जा रहा है। काग़ज़ों में आंकड़े भले ही उत्साहजनक दिखें, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
मिली जानकारी के अनुसार इस वर्ष की धान खरीदी में किसानों को अपेक्षित लाभ के बजाय भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि इस बार वे न तो संतोषजनक मात्रा में धान बेच सके और न ही खरीदी केंद्रों में उन्हें वह सुविधाएँ मिल पाईं, जिनका दावा शासन द्वारा किया जाता रहा है। अव्यवस्था और अनदेखी ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
इसी कड़ी में यदि धरमजयगढ़ के मुख्यालय धान मंडी केंद्र की बात करें, जहां पर शासकीय प्रबंधक , धान मंडी केंद्र संचालन कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यहां की स्थिति शुरू से ही विवादों में रही है। किसानों के अनुसार धान खरीदी के आरंभिक दिनों से ही वे तरह-तरह की समस्याओं से जूझते रहे हैं, जो आज भी जस की तस बनी हुई हैं। शासकीय आदेश के अनुसार जहां धान की तौल 40 किलो 700 ग्राम निर्धारित है, वहीं मंडी प्रबंधन द्वारा 41 किलो 200 ग्राम से लेकर 300 और 400 ग्राम तक तौल लिया जा रहा है। इस अतिरिक्त तौल का विरोध करने पर किसानों को उनके धान में दोष निकालकर अनावश्यक रूप से परेशान किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब जमरगी जैसे केंद्रों पर हालात इस कदर बिगड़ रहे हैं, तो अन्य धान मंडी केंद्रों की स्थिति क्या होगी? किसानों का आरोप है कि कई मंडी प्रबंधकों का रवैया ऐसा है मानो नियमों से ज्यादा निजी लाभ को प्राथमिकता दी जा रही हो। वहीं किसानों की जुबान पर एक ही टीस है,कि कुछ प्रबंधक से लेकर अधिकारी-कर्मचारी अपनी कमाई के चक्कर में किसानों के पेट पर लात मार रहे हैं।
और आगे बता दें,स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। किसानों का कहना है कि मंडी में हमाली का कार्य भी उन्हें स्वयं करना पड़ता है, जबकि यह व्यवस्था प्रबंधन की जिम्मेदारी होती है। इतना ही नहीं, मंडी परिसर में पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा तक उपलब्ध नहीं है, जिससे घंटों लाइन में खड़े किसानों की परेशानी और बढ़ जाती है।
बहरहाल, शासन-प्रशासन के नियम-कायदे अपनी जगह हैं, लेकिन धरमजयगढ़ मुख्यालय धान मंडी केंद्र के प्रबंधक एवं अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों के रवैये को लेकर भी किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सवाल यह नहीं कि नियम क्या कहते हैं, सवाल यह है कि नियमों का पालन ज़मीनी स्तर पर क्यों नहीं हो रहा।
वहीं सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि जब मुख्यालय धान मंडी केंद्र की यह स्थिति है, तो दूरदराज़ के अन्य धान खरीदी केंद्रों का हाल कैसा होगा? क्या वहां भी किसान इसी तरह अव्यवस्था और मनमानी के बोझ तले दबे हैं? यह सवाल अब केवल धरमजयगढ़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे तंत्र की कार्यशैली पर एक गंभीर चिन्ह लगाता है।
